06/06/2026
"आम की मिठास तभी असली है, जब पकाने की प्रक्रिया वैज्ञानिक और सुरक्षित हो"
– प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
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उपभोक्ता स्वास्थ्य और फल गुणवत्ता की सुरक्षा हेतु वैज्ञानिक पहल
आम (Mangifera indica L.) भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय फल है, जिसे उसके उत्कृष्ट स्वाद, सुगंध, पोषण मूल्य एवं आर्थिक महत्व के कारण “फलों का राजा” कहा जाता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है, जहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों टन आम का उत्पादन होता है। फल के पकने की प्रक्रिया उसकी गुणवत्ता, स्वाद, रंग, सुगंध तथा पोषण मूल्य को निर्धारित करती है। इसलिए आम का सुरक्षित एवं वैज्ञानिक रूप से पकाया जाना अत्यंत आवश्यक है।
दुर्भाग्यवश, बाजार में शीघ्र लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछ व्यापारी अभी भी कैल्शियम कार्बाइड जैसे प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग करते हैं। यह न केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि फल की गुणवत्ता और बाजार की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है। वर्तमान समय में खाद्य सुरक्षा, निर्यात मानकों तथा उपभोक्ता जागरूकता को देखते हुए वैज्ञानिक पकाने की तकनीकों का उपयोग अनिवार्य हो गया है।
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फल पकने की वैज्ञानिक प्रक्रिया
आम एक जलवायु-उत्कर्षी (Climacteric) फल है। ऐसे फलों में तुड़ाई के बाद भी पकने की क्षमता बनी रहती है। पकने की प्रक्रिया में एथिलीन नामक प्राकृतिक पौध हार्मोन प्रमुख भूमिका निभाता है। एथिलीन के प्रभाव से फल में निम्न परिवर्तन होते हैं—
• स्टार्च का शर्करा में परिवर्तन
• गूदे का मुलायम होना
• आकर्षक रंग का विकास
• सुगंधित यौगिकों का निर्माण
• अम्लता में कमी
• स्वाद एवं मिठास में वृद्धि
इसी कारण वैज्ञानिक पकाने की अधिकांश तकनीकें एथिलीन आधारित होती हैं।
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कैल्शियम कार्बाइड: एक गंभीर स्वास्थ्य खतरा
कैल्शियम कार्बाइड के संपर्क में आने पर एसीटिलीन गैस उत्पन्न होती है, जो एथिलीन के समान प्रभाव तो दिखाती है, लेकिन फल पकाने के लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती। औद्योगिक ग्रेड कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक तथा फॉस्फोरस युक्त अशुद्धियाँ हो सकती हैं।
इसके संभावित दुष्प्रभावों में शामिल हैं—
• सिरदर्द एवं चक्कर आना
• आंखों एवं त्वचा में जलन
• श्वसन संबंधी समस्याएँ
• पाचन तंत्र में विकार
• यकृत एवं गुर्दों पर प्रतिकूल प्रभाव
• दीर्घकालिक विषाक्तता का जोखिम
इसी कारण भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा फल पकाने में कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है।
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वैज्ञानिक एवं सुरक्षित आम पकाने की विधियाँ
1. उचित परिपक्वता पर तुड़ाई
सुरक्षित पकाने की प्रक्रिया का पहला चरण सही अवस्था में फल की तुड़ाई है। अत्यधिक कच्चे फलों में स्वाद, रंग और सुगंध का समुचित विकास नहीं हो पाता।
आम की परिपक्वता के प्रमुख संकेत हैं—
• फल का आकार पूर्ण विकसित होना
• गालों का उभार स्पष्ट होना
• छिलके का गहरा हरा रंग हल्का पड़ना
• डंठल के समीप भाग का भराव
• विशिष्ट किस्मीय परिपक्वता अवधि का पूरा होना
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि उचित परिपक्वता पर तोड़े गए फल बेहतर गुणवत्ता और अधिक भंडारण क्षमता प्रदर्शित करते हैं।
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2. प्राकृतिक एथिलीन प्रेरण विधि
घरेलू स्तर पर कच्चे आमों को पके केले, पपीते अथवा पहले से पके आमों के साथ बंद पात्र में रखने से प्राकृतिक एथिलीन का उत्सर्जन होता है। यह गैस आसपास के फलों में पकने की प्रक्रिया को सक्रिय करती है।
इस विधि के लाभ हैं—
• पूर्णतः सुरक्षित
• कम लागत
• रसायन-मुक्त
• घरेलू उपयोग हेतु उपयुक्त
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3. भूसा अथवा कागज आधारित पकाने की विधि
परंपरागत रूप से आमों को गेहूँ अथवा धान के सूखे भूसे में रखा जाता है। वर्तमान में स्वच्छ कागज आधारित पैकिंग का भी उपयोग किया जाता है।
इस तकनीक में—
• तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहता है।
• एथिलीन गैस का स्थानीय संचय होता है।
• नमी का संतुलन बना रहता है।
• फल समान रूप से पकते हैं।
हालांकि, अत्यधिक नमी वाले भूसे का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे कवकीय संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
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4. एथिलीन जनरेटर आधारित पकाने की आधुनिक तकनीक
व्यावसायिक स्तर पर आज सर्वाधिक स्वीकार्य तकनीक एथिलीन रिपनिंग चैंबर है। इसमें नियंत्रित तापमान एवं आर्द्रता के साथ एथिलीन गैस का प्रयोग किया जाता है।
आदर्श परिस्थितियाँ—
• तापमान: 18–24°C
• सापेक्षिक आर्द्रता: 90–95%
• एथिलीन सांद्रता: 100–150 ppm
• उपचार अवधि: 24–48 घंटे
इस तकनीक से—
• फल समान रूप से पकते हैं।
• रंग विकास बेहतर होता है।
• मिठास एवं सुगंध में वृद्धि होती है।
• बाजार योग्य गुणवत्ता प्राप्त होती है।
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5. आधुनिक रिपनिंग चैंबर तकनीक
वर्तमान समय में नियंत्रित वातावरण वाले रिपनिंग चैंबर बड़े व्यापारिक केंद्रों तथा निर्यात इकाइयों में व्यापक रूप से अपनाए जा रहे हैं।
इन चैंबरों में निम्न सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं—
• स्वचालित तापमान नियंत्रण
• नियंत्रित आर्द्रता
• एथिलीन डोजिंग प्रणाली
• वायु परिसंचरण व्यवस्था
• गुणवत्ता निगरानी प्रणाली
इससे फलों की एकरूपता, शेल्फ लाइफ तथा उपभोक्ता स्वीकार्यता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
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ईथेफोन (एथ्रेल) के उपयोग पर वर्तमान दृष्टिकोण
पूर्व में ईथेफोन (2-क्लोरोएथिल फॉस्फोनिक अम्ल) का उपयोग फल पकाने हेतु किया जाता था क्योंकि यह एथिलीन उत्पन्न करता है। किंतु वर्तमान खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार खाद्य पदार्थों के प्रत्यक्ष संपर्क में इसके उपयोग को सीमित किया गया है। इसलिए किसानों एवं व्यापारियों को केवल स्वीकृत एथिलीन आधारित प्रणालियों का उपयोग करना चाहिए।
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उपभोक्ता कैसे पहचानें सुरक्षित रूप से पके आम?
वैज्ञानिक रूप से पके आमों में सामान्यतः—
• रंग अपेक्षाकृत समान होता है।
• गूदे में मिठास समान रूप से विकसित होती है।
• प्राकृतिक सुगंध आती है।
• फल बाहर और भीतर दोनों ओर से समान रूप से पका होता है।
जबकि कृत्रिम रूप से कार्बाइड द्वारा पकाए गए फलों में अक्सर—
• बाहरी रंग पीला लेकिन अंदरूनी भाग कच्चा रहता है।
• स्वाद असमान होता है।
• सुगंध कम विकसित होती है।
• पकने में एकरूपता नहीं होती।
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अंत में
स्वस्थ समाज के निर्माण में सुरक्षित खाद्य पदार्थों की महत्वपूर्ण भूमिका है। आम जैसे लोकप्रिय फल की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसानों, बागवानों, व्यापारियों तथा उपभोक्ताओं को वैज्ञानिक फल पकाने की तकनीकों को अपनाना चाहिए। कैल्शियम कार्बाइड जैसे प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है। आधुनिक एथिलीन आधारित रिपनिंग चैंबर, प्राकृतिक एथिलीन प्रेरण तथा नियंत्रित पकाने की तकनीकें आज सुरक्षित, प्रभावी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत विकल्प हैं।
“स्वस्थ फल, सुरक्षित उपभोक्ता और विश्वसनीय बाजार — यही वैज्ञानिक फल उत्पादन का मूल उद्देश्य होना चाहिए।”