21/04/2026
कल की यह घटना केवल एक केस की नहीं, बल्कि न्याय और व्यवस्था के बीच खड़े एक मजबूत सिद्धांत की कहानी है।
आज अदालत में एक असाधारण दृश्य देखने को मिला। जब राहुल गांधी जी की नागरिकता से जुड़े मामले पर सुनवाई हो रही थी, तो माननीय जज साहब ने साफ शब्दों में कहा “मैं इस केस की सुनवाई नहीं कर सकता।”
यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक था।
राहुल गांधी के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों से भाजपा समर्थित कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात के लोग दूसरे राज्यों में जा कर लगातार फर्जी मामले उठाते रहे हैं।
लेकिन आज का मामला थोड़ा अलग था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में यह याचिका आई, जो पहले भी कई बार दायर होकर खारिज हो चुकी थी।
सरकार की ओर से वकील लगातार FIR दर्ज कराने का दबाव बना रहे थे। तब जज साहब ने राहुल गांधी जी को नोटिस जारी कर दिया, लेकिन जब जज साहब को Jagannath Verma vs State of Uttar Pradesh के फुल बेंच फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें D. Y. Chandrachud की पीठ ने स्पष्ट कहा था कि बिना दूसरे पक्ष को सुने FIR का आदेश नहीं दिया जा सकता।
लेकिन सरकार का पक्ष और भाजपा का वह नेता जो मुक़दमा किया था वह अपनी हरकत पर आ गया, सरकारी पक्ष अपने ग़लत तर्कों पर अड़ा रहा, तब जज साहब ने खुले न्यायालय में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। संदेश साफ था कानून अभी भी जिंदा है, और हर व्यक्ति दबाव में नहीं झुकता।
आखिरकार, उन्होंने स्वयं को इस केस की सुनवाई से अलग कर लिया।
यह कदम कई सवाल छोड़ जाता है, लेकिन एक बात साफ करता है न्यायपालिका में आज भी ऐसे लोग हैं जो सिद्धांतों के साथ खड़े रहते हैं।
यह घटना मुझे उस पुराने संसदीय क्षण की भी याद दिलाती है, जब गोरखपुर के MLC श्रीदेवेंद्र प्रताप सिंह ने एक विवादित बिल पास कराने को लेकर पीठासीन होने से इनकार कर दिया था।
भले ही बिल पास हो गया, लेकिन इतिहास ने यह दर्ज किया कि कुछ लोग सत्ता से ऊपर उठकर अपने विवेक का सम्मान करते हैं।
व्यवस्था चाहे कितनी भी जटिल क्यों न हो, जब-जब कोई व्यक्ति दबाव के आगे झुकने से इनकार करता है वहीं से लोकतंत्र की असली ताकत दिखाई देती है।
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