16/05/2026
इतिहास के पन्नों में कई वीर हुए, लेकिन कल्ला रायमलोत जैसा कोई विरला ही था, जिसने भरे दरबार में बादशाह अकबर की आँखों में आँखें डालकर अपनी मूंछों पर ताव दिया था।
किस्सा आगरा दरबार का:
एक बार अकबर के दरबार में जब बादशाह ने बूंदी के राजा भोज की पुत्री का प्रस्ताव शहजादे सलीम के लिए रखा, तो राजा भोज धर्मसंकट में पड़ गए। बादशाह का भय था, लेकिन स्वाभिमान गवाही नहीं दे रहा था।
उस भरे दरबार में सन्नाटे को चीरते हुए राव कल्ला रायमलोत खड़े हुए। उन्होंने अपनी मूंछों पर निर्भीकता से ताव देते हुए कहा-
🗣️ "जहाँपनाह! बूंदी की उस राजकुमारी की सगाई तो मेरे साथ हो चुकी है।"
अकबर ने कड़क कर पूछा- "किसके साथ?"
कल्ला जी ने उत्तर दिया- "मेरे साथ! वह मेरी मांग है।"
यह केवल एक जवाब नहीं, बल्कि एक क्षत्रिय का बादशाह को सीधा चुनौती थी।
जीवित रहते सुने अपने ही मरसिये (मृत्यु गीत):
कल्ला जी को पता था कि अब युद्ध निश्चित है। उन्होंने बीकानेर के प्रसिद्ध भक्त-कवि पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) से अपने मरसिये (शोक गीत) जीवित रहते ही सुनने की जिद की।
उन्होंने वचन दिया: "काकाजी! आप जैसा वर्णन मेरे युद्ध का करेंगे, मैं रणभूमि में ठीक वैसा ही पराक्रम दिखाऊंगा।"
सीस कटने के बाद भी लड़ा धड़:
सिवाना के ऐतिहासिक युद्ध में कल्ला रायमलोत ने वह कर दिखाया जो असंभव था। कहते हैं, युद्ध में उनका शीश कट गया, लेकिन उनका धड़ दोनों हाथों में तलवार लेकर मुगलों पर कहर बनकर टूटता रहा। अंत में, जब उनकी पत्नी हाड़ी रानी ने गंगाजल के छींटे दिए, तब जाकर वह शांत हुआ।
आज भी राजपूताना में जब मूंछों की बात होती है, तो जुबां पर एक ही नाम आता है- कल्ला रायमलोत!
नमन है ऐसे वीर योद्धा को!