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B.K.S HUMANITY, EDUCATION, ENTERTAINMENT

04/01/2025

अगर कोई भी पुलिस ऑफिसर आप पर चिल्लाता है या लोगों के सामने आपकी बेइज्जती करता है, आपको गाली देता है या आपकी बदनामी करता है तो आप भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 356 के तहत कोर्ट में शिकायत कर सकते हैं। दोषी पाए जाने पर ऐसे पुलिसकर्मी को 2 साल तक की जेल हो सकती है।
अगर कोई पुलिस अधिकारी आपको किसी झूठे केस में फंसाने की कोशिश करता है और इसके नकली दस्तावेज भी बना लेता है, तो आप एक्शन ले सकते हैं। आप भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 201 के तहत आप कोर्ट में शिकायत कर सकते हैं और कोर्ट ऐसे पुलिसकर्मी को 3 साल तक की जेल कर सकता है।
अगर कोई पुलिस वाला आपसे मारपीट करता है तो आपको डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप उसके खिलाफ एक्शन ले सकते हैं। आपको करना ये है कि ऐसे पुलिस वाले की वीडियो बना लें और फिर इस वीडियो सहित पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी को शिकायत करें। इसके बाद पुलिस वाले को सस्पेंड किया जा सकता है।

23/12/2024

Warrant trial
262. (1) The accused may prefer an application for discharge within a period of sixty days from the date of supply of copies of documents under section 230
262. (1) अभियुक्त धारा 230 के अधीन दस्तावेजों की प्रतियां प्रदान किए जाने की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर उन्मोचन के लिए आवेदन कर सकेगा।
230. In any case where the proceeding has been instituted on a police report, the Magistrate shall without delay, and in no case beyond fourteen days from the date of production or appearance of the accused, furnish to the accused and the victim (if represented by an advocate) free of cost, a copy of each of the following:—
(i) the police report;
(ii) the first information report recorded under section 173;
(iii) the statements recorded under sub-section (3) of section 180 of all persons whom the prosecution proposes to examine as its witnesses, excluding therefrom any part in regard to which a request for such exclusion has been made by the police officer under sub-section (7) of section 193;
(iv) the confessions and statements, if any, recorded under section 183;
(v) any other document or relevant extract thereof forwarded to the Magistrate with the police report under sub-section (6) of section 193:
Provided that the Magistrate may, after perusing any such part of a statement as is referred to in clause (iii) and considering the reasons given by the police officer for the request, direct that a copy of that part of the statement or of such portion thereof as the Magistrate thinks proper, shall be furnished to the accused:
Provided further that if the Magistrate is satisfied that any such document is voluminous, he shall, instead of furnishing the accused and the victim (if represented by an advocate) with a copy thereof, may furnish the copies through electronic means or direct that he will only be allowed to inspect it either personally or through an advocate in Court:
Provided also that supply of documents in electronic form shall be considered as duly furnished.
230. किसी भी मामले में जहां कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट पर शुरू की गई है, मजिस्ट्रेट बिना किसी देरी के, और किसी भी मामले में अभियुक्त के उत्पादन या उपस्थिति की तारीख से चौदह दिनों से अधिक नहीं, अभियुक्त और पीड़ित को (यदि किसी वकील द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है) निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति निःशुल्क प्रदान करेगा: - (i) पुलिस रिपोर्ट; (ii) धारा 173 के तहत दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट; (iii) धारा 180 की उप-धारा (3) के तहत उन सभी व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए हैं, जिनकी अभियोजन पक्ष अपने गवाहों के रूप में जांच करने का प्रस्ताव करता है, जिसमें से किसी भी भाग को छोड़कर जिसके संबंध में पुलिस अधिकारी द्वारा धारा 193 की उप-धारा (7) के तहत ऐसे बहिष्कार का अनुरोध किया गया है; (iv) धारा 183 के तहत दर्ज किए गए बयान और बयान, यदि कोई हो; (v) धारा 193 की उपधारा (6) के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजा गया कोई अन्य दस्तावेज या उसका प्रासंगिक अंश:
बशर्ते कि मजिस्ट्रेट, खंड (iii) में निर्दिष्ट कथन के किसी ऐसे भाग का अवलोकन करने के पश्चात और पुलिस अधिकारी द्वारा अनुरोध के लिए दिए गए कारणों पर विचार करने के पश्चात निर्देश दे सकता है कि कथन के उस भाग की या उसके ऐसे भाग की, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, प्रति अभियुक्त को दी जाएगी:
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट को यह विश्वास हो कि ऐसा कोई दस्तावेज बहुत बड़ा है, तो वह अभियुक्त और पीड़ित (यदि अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को उसकी प्रति देने के बजाय, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतियां दे सकता है या निर्देश दे सकता है कि उसे केवल व्यक्तिगत रूप से या न्यायालय में अधिवक्ता के माध्यम से इसका निरीक्षण करने की अनुमति होगी:
बशर्ते कि इलेक्ट्रॉनिक रूप में दस्तावेजों की आपूर्ति को विधिवत् रूप से प्रदान किया गया माना जाएगा।

258. (1) After hearing arguments and points of law (if any), the Judge shall give a judgment in the case, as soon as pos...
23/12/2024

258. (1) After hearing arguments and points of law (if any), the Judge shall give a judgment in the case, as soon as possible, within a period of thirty days from the date of completion of arguments, which may be extended to a period of forty-five days for reasons to be recorded in writing
258. (1) तर्कों और विधि के बिंदुओं (यदि कोई हों) को सुनने के पश्चात, न्यायाधीश मामले में यथाशीघ्र, तर्कों के पूरा होने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर निर्णय देगा, जिसे लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से पैंतालीस दिन की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।
Argument 258. (1) तर्कों और विधि के बिंदुओं (यदि कोई हों) को सुनने के पश्चात, न्यायाधीश मामले में यथाशीघ्र, तर्कों के पूरा होने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर निर्णय देगा, जिसे लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से पैंतालीस दिन की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।
Argumenta पूरा होने के date से 30 दिनों के अंदर अधिकतम 45 days

23/12/2024

BNSS 251b) is exclusively triable by the Court, he shall frame in writing a charge against the accused within a period of sixty days from the date of first hearing on charge.
ख) यदि मामला विशेष रूप से न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तो वह आरोप पर प्रथम सुनवाई की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप तैयार करेगा।
60 days from the date of first hearing

23/12/2024

BNSS 250. (1) The accused may prefer an application for discharge within a period of sixty days from the date of commitment of the case under section 232.
250. (1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की प्रतिबद्धता की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर निर्वहन के लिए एक आवेदन को प्राथमिकता दे सकता है।
60 days
This is new provision

31/08/2024

**Part two*
यदि चार्जशीट file होने के बाद मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोपी पर case चलाने का कोई पर्याप्त sufficient grounds नही है तो
*Session court BNSS की धारा 250 के तहत*
*Magistrate court BNSS की धारा 262 के तहत और complain case hai BNSS के धारा 268 के तहत discharga उन्मोचित कर देगा।*
और यदि लगता है कि केस चलाने के पर्याप्त आधार है तो फिर ट्रायल proceeding शुरू किया जाता है।
*इसमें सबसे पहले आरोपी को BNSS की धारा 230 (207crpc) के तहत चार्जशीट की कॉपी दी जाती है जिसे पुलिस पेपर भी कहा जाता है। यदि कोई दस्तावेज नही दिया गया है तो आरोपी के अधिवक्ता आवेदन द्वारा ले सकता है। या चार्ज शीट की कमियों को कोर्ट मे ऑर्डरशीट पर लेखबद्ध कराते हैं जिससे कि वे बाते केस के फाइनल arguement मे आ सके, आरोपी के खिलाफ ना जाए।
ऑर्डरशीट वह होता है जिसपर पेशी के दिन कोर्ट में क्या क्या कारवाई हुई वह सब लिखा जाता है।

*चार्ज फ्रेम*
*Session court BNSS की धारा 251 में करता है*
*Magistrate court BNSS की धारा 263*
*Charge alter बदलना BNSS की धारा 239,244 में*
*चार्जशीट के पेपर कारवाई पूरी होने के बाद चार्ज पर बहस होता है इसके लिए एक पेशी date fixed की जाती है।*
*चार्ज का मतलब होता है है आरोपी पर धाराए लगाना, किन किन धाराओं में उस पर केस बनता है और उन पर किन धाराओं में उस केस को चलना चाहिए इसे चार्ज फ्रेम कहा जाता है।*
चार्ज शीट को पढ़ने के बाद यदि court को लगे कि आरोपी पर चार्ज फ्रेम करना बनता है लेकिन पुलिस ने जो धारा लगाई वो सही नहीं है तो BNSS की धारा 239,244 के तहत उन धाराओं को बदल कर नई धारा मे भी चार्ज लगा सकता है ये judgement के पहले तक कभी भी alter किया जा सकता है।
फिर plea of guilt session court 252, magistrate court 264
चार्ज फ्रेम के बाद कोर्ट आरोपी से पूछता क्या उसे अपना गुनाह कबूल है, अगर वो अपना गुनाह कबूल कर लेता है तो उसी वक्त या अगला पेशी पर सजा सुना दी जाती हैं और ट्रायल यहीं समाप्त हो जाता है।ये court के विवेक पर भी निर्भर करता है।
लेकिन आम तौर पर गुनाह कबूल नहीं किया जाता है और वो कहता है कि ट्रायल फेस करेगा।
तो फिर prosecusion witness गवाही पर चला जाता है
Session court में prosecusion witness का गवाही BNSS के धारा 254, मे मजिस्ट्रेट court 265 मे की जाती है इसका procedure के बारे में bnss की धारा308,309, 310,311,(307_336)
फिर accused का स्टेटमेंट BNSS 351(313सीआरपीसी) के तहत किया जाएगा
उसके बाद डिफेंस के evidence 256में session court,266 before magistrate case based on FIR 270 case based on complained

*गवाही*
ट्रायल शुरू होने के बाद चार्जशीट के लिस्ट में गवाहों के नाम के अनुसार भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 142 के तहत chief in examination/cross examination होता है।
पीड़ित पक्ष यानी prosecusion witness को PW 1,PW 2
DEFENCE WITNESSES को DW 1,DW 2 so on के नाम से जानते हैं।
यदि prosecussion के गवाहों के द्वारा कोई सबूत पेश किया जाता है तो उसे Ex -p1,Ex-p 2
DEFENCE के द्वारा Ex D1,exd2 के रुप मे exibit प्रदर्शित किया जाता है।EX के मतलब EXIBIT होता है।
सबसे पहले पीड़ित VICTIM के गवाही इसके बाद EYE witness फिर डॉक्टर का अंत में आईओ का गवाही होता है।
पहले अभियोजन पक्ष के APP या PP (सरकारी वकील) गवाहों के मुख्य परीक्षण करता है फिर आरोपी के अधिवक्ता उसे CROSS EXAMINATION जिरह करते हैं।
ध्यान रखने वाली बात है की भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 151,152,154 के तहत आरोपी के अधिवक्ता अभियोजन पक्ष के गवाहों से ऐसा बिना आधार के कोई प्रश्न नहीं करेगा जिस से कि गवाह के चरित्र पर आंच आए। यदि आरोपी के अधिवक्ता बीना कोर्ट के परमिशन से ऐसा प्रश्न पूछता है तो न्यायालय की अवमानना कहा जाएगा और ऐसी स्थिति में वह मजिस्ट्रेट या न्यायधीश आरोपी के अधिवक्ता का रिपोर्ट हाई कोर्ट या BAR COUNSIL से कर सकता है।
यदि कोइ नया तथ्य या बात, बाद मे कोर्ट के सामने आते हैं तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 143(3) के तहत फिर से गवाही कराई जा सकती है इसे RE EXAMINATION कहा जाता है bnss की धारा 348 के तहत re examination के लिए sommon कर सकते हैं।
अगर अभियोजन पक्ष के गवाह अपने बयान से मुकर जाता है तो सरकारी वकील भारतीय साक्ष्य अधिनियम के धारा 157के तहत खुद गवाह को ❌ करेगा, ये साबित करने के लिए कि वो गवाह जानबूझकर आरोपी को फायदा पहुंचाने के लिए झूठ बोल रहा है।
यदि कोई गवाह किसी प्रशन के उत्तर देने से बच रहा है या मना कर रहा है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के धारा 137और 150 के तहत उसके प्रश्न का उतर देने के लिए मजबूर भी कर सकता है। अगर महिला या लड़की रेप का victim है और उसके 183 के बयान जिस मजिस्ट्रेट ने दर्ज किए हैं और case session trial है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 127 के तहत उस मजिस्ट्रेट को session court द्वारा बुलाया जाएगा।

31/08/2024

*जमानत आरोपी द्वारा*
*अगर आरोपी arrest नही हुआ है तो अपने अधिक्वक्त के माध्यम से BNSS के धारा 482 के तहत हाई कोर्ट या session court में anticeptory bail का आवेदन कर सकता है।
BNSS के धारा 480 के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में bail file kar सकता है
*483 के तहत हाई कोर्ट या session कोर्ट में special power of HC, SESSION COURT*
शिकायत कर्ता या पीड़िता उसी कोर्ट में बेल मे आपत्ति या बेल के खिलाफ BAIL CANCELLATION का आवेदन कर सकता है।

आईओ केस की जांच करता है पटवारी द्वारा घटना की जगह के NAKSAA बनवाता है, जरूरी कागजात और व्यक्तियों से सबूत लेता है धारा 180 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करता है।
अगर IO जांच मे यह पाता है की शिकायत कर्ता की शिकायत झूठी थी या पर्याप्त सबूत नहीं है तो पुलिस BNSS के धारा 189 के तहत FALSE REPORT/CLOSURE रिपोर्ट। कोर्ट में दायर कर केस खत्म कर सकता है।
आगर पर्याप्त सबूत है है तो चार्जशीट फाइल करता है।

और यदि आरोपी के पास पुख्ता सबूत है कि पुलिस उसे झूठा फंसा रही हैं तो धारा 528 के तहत हाई कोर्ट मे FIR निरस्त QUASH के लिए आवेदन कर सकता है।

BNSS की धारा 187(3) के तहत पुलिस द्वारा किसी CASE मे चार्ज शीट फाइल करने की साम्य सीमा 90दिन (जिस अपराध की सजा दस साल से अधिक है)60 दिन (जिस अपराध की सजा 10वर्ष से कम है।
यदि तय समय सीमा में फाइल नही करता है तो इस धारा के तहत+भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत डिफॉल्ट BAIL के RIGHT आरोपी को मिल जाएगा यदि वो जेल में बंद हैं तभी।
चार्ज शीट मे निम्न चीजे सामिल होते हैं
1शिकायत कर्ता/पीड़ित और आरोपी के नाम
2 शिकायत कर्ता के शिकायत पत्र fir
3 अपराध की सूचना की प्रकृति कैसे सूचना मिली
4 पीड़ित और आरोपी के मेडिकल reoport
5आरोपी के areest से संबंधित पेपर
6गवाहों के180 के तहत बयान
7जब्त किया हुआ हथियार या समान
8घटना के नक्सा
9 अन्य कोइ पेपर
10BNSS 176के तहत वीडियो ग्राफी और फोरेंसिक रिपोर्ट इत्यादि।

31/08/2024

Criminal case की पूरी ट्रायल
Criminal case की ट्रायल दो तरह के होते हैं एक based on fir 173 BNSS ii based on complained case 223BNSS
Complain case 2(h), 223BNSS , वो होता है या पुलिस के पास FIR दर्ज करने के POWER नही होता है या फिर जानबूझकर दर्ज नहीं करता है।
पुलिस FIR 173 BASED CASE के तीन पार्ट है पहला
1INVESTIGATION चार्ज शीट फाइल करने के पहले
2 TRIAL स्टेज चार्जशीट फाइल करने के बाद।
3 JUDGEMENT AND APPEAL MERCY PETITION दया याचिका

*INVESTIGATION* FIRST STEP BEFORE FILING CHARGEMSHEET U/S 193BNSS
अपराध होने के बाद सबसे पहला काम होता है उसकी सूचना थाने को देना। सूचना देने वाले को शिकायतकर्ता कहते हैं, शिकायत कर्ता कोइ भी हों सकता है।
जब पुलिस गस्त पर है कोइ अपराध होते देखता है तो पुलिस उस case का शिकायत कर्ता हों सकता है या कोइ मुखबरी से सूचना मिले तो पुलिस शिकायत कर्ता होगा।
*पीड़ित victim 2(y)bnss*, जिसके साथ अपराध होता है।
*आरोपी*वह व्यक्ति होता है जो अपराध करता है। जब अपराध की सूचना मिलता है bnss activate हो जाता है।
सूचना मिलते ही पुलिस एफआईआर दर्ज करती है और समय नही है तो घटनास्थल पर जाकर मामले को काबू में करके फिर एफआईआर दर्ज करती है।
मामला संज्ञे 2(जी) अपराध का है आरोपी नही पकड़ा गया तो *धारा 35* के तहत बिना वारंट आरोपी को अरेस्ट करेगा।
*Arrest के धारा 49* के तहत आरोपी के *तलाशी* लेगा।
*धारा 185* के तहत उस जगह की तलाशी लेगा जहां आरोपी को अरेस्ट किया गया है।
आरोपी के कपड़े को छोड़कर जो भी समान मिला जब्त कर लेगा और जब्ती रशीद आरोपी को दे देगा।
इसके बाद धारा 36(c) के तहत आरोपी के परिचित, या संबंधी को सूचना देगा, जरूरत हुआ तो वो उसके घर जाकर सूचना देगा।
अगर अपराध जमानतीय है तो धारा 47 के तहत आरोपी को बताएगा कि उनको bail के right है।

*पुलिस एफआईआर करने के पहले या बाद मे जैसा वो उचित समझे आरोपी और पीड़ित को बन
BNSS की धारा 51,52,53,ACUCCED, 184(VICTIM),397,
के तहत मेडिकल परीक्षण के लिए सरकारी या प्राइवेट हॉस्पिटल ले जायेंगे।
*BNS भारतीय न्याय संहिता की धारा 30 के तहत एक डॉक्टर घायल या रोगी के इलाज उसके सहमति के बिना उसके जीवन रक्षा के लिए कर सकता है।*
*BNS भारतीय न्याय संहिता *की धारा 200 के कोई भी हॉस्पिटल पीड़ित व्यक्ति के इलाज करने से मना नही कर सकता है।*

*यदि मामला R**E का है तो BNSS की धारा 184(6) के तहत 7 दिनों के अंदर डॉक्टर को रेप की जांच रिपोर्ट पुलिस थाने को भेजना है।**

इन सब कार्यवाही के बाद पुलिस को लगता है कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं तो 478 के जमानत दे देगा।

*अगर मामला R**E या MURDER के है तोधारा 58के तहत आरोपी को 24 घंटा के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करेगा।**

पर जिन अपराध की सजा 7 वर्ष से कम है पुलिस द्वारा 35 (3) के नोटिश देकर छोड़ देगा।(Case law अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य 2014)
आरोपी से पूछताछ के लिए पुलिस मजिस्ट्रेट से 187 में पुलिस कस्टडी से मांग सकता है ये मजिस्ट्रेट के उपर निर्भर करता है कि वो ALLOW या DISALLOW करे।
187(3) के तहत पुलिस कस्टडी 15 दिनों से अधिक नही हों सकता है। पुलिस कस्टडी में नही भेजा तो ज्यूडिशियल कस्टडी में भेजेगा।
FIR जमानत की POWER MAGISTRATE के पास होगा।

यादि मामला SESSION TRIAL का है (MURDER,R**E ETC)
तो धारा 232 के तहत सेशन कोर्ट को भेज देंगे।
क्योंकि धारा 22 के तहत SESSION COUR को कोई भी सजा कानून के प्रावधान के तहत सुनाने की सकती है।
धारा 23 के तहत मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास को 3 साल तक की सजा, 50000पचास हजार तक के जुर्माना से दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।

30/03/2024

Strike out,adding or substitute rule 10
To bring a case within this sub rule,the following three conditions (Razia Begum v sahebzadi anwar began AIR 1958,RAMJIBHAI PATEL V ANANDIBAI RAMA 2018)
1 The suit has been filed in the name of a wrong person as plantiff
2such mistake must be bonafied and
3 the substitution or addition of the plantiff is necessary for the determination of the real matter in dispute.
Illustration
1 C,the agent of A,under a bonafide mistake files a suit against B in his own name.The court can substitute the principal A for that of the orginal plantiff C

30/03/2024

f) all objections on the ground of non-Joinder or misjoinder of parties:rule 13
च) पार्टियों के गैर-संयोजक या गलत संबंध के आधार पर सभी आपत्तियां: नियम 13
all objections on the ground of non -joinder of parties must be taken at the earliest opportunity, otherwise they will be demeed to have been waived.
पार्टियों के गैर-जॉइंडर के आधार पर सभी आपत्तियों को जल्द से जल्द लिया जाना चाहिए, अन्यथा उन्हें माफ कर दिया जाएगा।

30/03/2024

Two tests have been laid down for determining the question whether a particular party is necessary party to a proceeding( Kasturi v Iyyamperumal Air 2005SCC733)
I)there must be a right to some relief against such party in respect of the matter involved in the proceedings in the question,and
2 it should not be possible to pass an effective decree in absence of such party

30/03/2024

Necessary party के अनुपस्थित में effective decree court pass नही कर सकता है
Proper party
ये necessary party नही होता है पर उनकी उपस्थिति कोर्ट को सक्षम बनाता है मदद करता है किसी matter को अच्छी adjudicate कर ने में
: Rule 10 order 1 court किसी भी stage पर party के आवेदन पर या court किसी का नाम जोड़ सकता है, या हटा सकता है।
10(4) अगर कोई नया defendant add होगा उस case me plaint को amend किया जायेगा और उसकी copy पुराने और नए defendenate को भेजा जाएगा।

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