Mantasha katib shayra

Mantasha katib shayra Dr Mantasha 'Qatib'

03/10/2026

ग़ज़ल
पेश ए ख़िदमत 🌹🌹

तुम्हारा जब से सजदा कर लिया है,
ये अपना वक़्त अच्छा कर लिया है।

तुम्हारे नाम की मालाएँ जपकर,
अजब दिल ने तमाशा कर लिया है।

गुलाबों का उसे तोहफ़ा देकर,
मोहब्बत ने भी सौदा कर लिया है।

किसी ने रात में चुपके से आकर,
मेरे ख़्वाबों में पहरा कर लिया है।

उसे हर वक़्त दिल ने याद करके,
कई ज़ख़्मों को ताज़ा कर लिया है।

डॉ. मंतशा ‘क़ातिब’

01/10/2026

शेर 🌹🌹

हवस को इश्क़ कहने वाले वफ़ा नहीं करते,
जो अहल-ए-इश्क़ होते हैं, ख़ता नहीं करते।

मंतशा क़ातिब

30/09/2026

(ग़ज़ल)🌹🌹

होके तुझसे जुदा दूर जाना नहीं
दिल का तेरे सिवा कुछ ठिकाना नहीं

रोज़ आओगे तुम मुझसे मिलने सनम
मैं सुनूंगी कोई भी बहाना नहीं

ख़्वाब पूरे करोगे यह वादा करो
झूठी बातों में मुझको रिझाना नहीं

वक्त हमको कभी अगर जुदा भी करे
याद में तुम मेरी आसूं बहाना नहीं

मंतशा ढूंढ ले चाहे सारा जहां
कोई तुझसा मिलेगा दीवाना नहीं

डॉ मंतशा क़ातिब

24/09/2026

पेश ए खिदमत
शेर
ये सब तो "मन्तशा" की राह की दुश्वारियां हैं
यही सफ़र है न हो अच्छा तो ख़राब सही!!!!

मन्तशा "कातिब"
बांदा यूपी

24/09/2026

पेश ए खिदमत
शेर
"मन्तशा" जैसा तुम्हे अब मिल नहीं सकता कोई ।
इस जहां में कुछ अजूबे अब तलक़ महफ़ूज़ हैं ।

मन्तशा "कातिब"
बांदा यूपी

24/09/2026

पेश ए खिदमत
शेर

इबादत रब की और सूरत यार की हो
सजदा रब का और रस्म प्यार की हो
आशिक़ों के मज़हब का क्या कहना
ज़िक्र रब का और बात यार की हो।

Mantasha 'Qatib'
Banda up.

24/09/2026

ग़ज़ल

आशिकी जब दरमियां बढ़ने लगीं
बिन तेरे तनहाइयां बढ़ने लगी

आस है तेरे मिलन की इस लिए
दिन ब दिन बेताबियां बढ़ने लगी

जिक्र तेरा महफिलों में जब हुआ
तो शेर में गहराईयां बढ़ने लगी

रोज़ बाते कर रहे थे फोन पर
आज क्यों खामोशियां बढ़ने लगी

इश्क़ में पागल हुआ सागर सनम
उसकी भी नादानियां बढ़ने लगी

मंतशा क़ातिब
बांदा यूपी

24/09/2026

ग़ज़ल

इश्क का रोग ऐसा लगाया गया
दूर रहकर भी रिश्ता निभाया गया

धड़कने ये अधूरी थी जिसके बिना
शख्स वो मेरे ख़्वाब में लाया गया

मेरी तकदीर में जो नहीं था लिखा
उसको तस्वीर से भी मिटाया गया

मैंने मांगी शिफा उनसे लेकिन मुझे
जख्म दे कर मुसलसल सताया गया

गैर के हाथों में सौंप कर दिल मेरा
ख़्वाब आंखों से मेरी चुराया गया

मंतशा क़ातिब
बांदा यूपी

24/09/2026

ये ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले


मेरी मझधार का इक किनारा हो तुम
टूटे इस दिल का मेरे सहारा हो तुम

अपनी छत से जिसे देखती रोज़ मैं
इश्क़ का मेरे वो चांद प्यारा हो तुम

याद करती हो तुम भी मुझे रोज़ ही
इन हवाओं का मिलता इशारा हो तुम

दिल अधूरा है तेरे बिना ऐ सनम
चलती सांसो का मेरी,गुज़ारा हो तुम

जिसके दम से है दुनिया मुक़म्मल मेरी
'मन्तशा' का कोई ख़्वाब प्यारा हो तुम

मंतशा " कातिब"

24/09/2026

🌹ये ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले🌹

मैं तो लम्हात के तेवर पे नजर रखती हूं
देख हर हाल में जीने का हुनर रखती हूं

गैर की राह पर चलना आदत नहीं मेरी
मैं जमाने से जुदा अपनी डगर रखती हूं

मैं वही खाक नशी हूं की जमी पर रहकर
चरख के चांद सितारों पर गुजर रखती हूं

वह निशानी तो मुकद्दर है हमेशा से मेरी
अपनी पहचान की एक छाप मगर रखती हूं

क्यों ना मकबूल हों " मंतशा "मेरी गजलें
मैं छुपाए हुए सीने में शरर रखती हूं

मन्तशा "क़ातिब"

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